उहे अदिमिया

” का भइया ! तोहार चाल हमके तनिको ना समझ में आवेला।अइसन धउरवला ह कि हाँफत-हाँफत करेजा दुखाय लागल। अइसन ऊँहवा का रहल ह भाय कि हेतना डेराय गइला ह ….आंय।” आपन गोल -गोल आँख नचावत, बहुत मुश्किल से मनोज अपने हंफरी के कंट्रोल  करे क कोशिश में लगल रहलन।परताप मुस्कियात चाह पियत कनखी से चौरसिया ओरी ताकत पुरहर भेद से भरल रहलन।जेतने मनोज परेशान ओतने परताप उनकी ओर से बेधियान।

” का हो भइया लोग ! कवने ओरी से गोल आवत हे ? का परभू इनहुँ के त ना ले लिहला अपने चपेट में।देखा बचवा बनारस में रहके बाबा बिसनाथ के बाहन सांड -वांड़ के चपेट में भले आ जइहा बाकिर एह परताप के चपेट में मत अइहा नाहीं त कवनों करम तोहार छूटी ना।लुटाय-पिटाय के बरोबर हो जइबा।” कह के चौरसिया हँसे लगलन।चौरसिया के हँसी क फुलझड़ी जेतने छूटे ओतने परताप के आँखि से क्रोध क लुत्ती छिटके।

खिसियात ,दाँत किटकिटावत कहलन –

” देखा ! इहे कुल सहूर तोहार हमके सोहाला ना।जब देखा तब पीछे पड़ल रहेला तू।एक त हम तोहार परमानेंट ग्राहक अउर दूसरे प्रचारक।अपने फेसबुक से लेके इंस्टा तक रील बना -बना के हम तोहार मुफ्त में प्रचार करीला का इहे कुल प्रपंच सहे खातिर। तोहके त हमार एहसान मानके स्पेशल चाह मुफ्त में पिआवे के चाही आ तू बेइज्जत करे में लवलीन हउवा।जा भइया बहुत देखलीं बाकिर तोहरे नियन एहसान फरामोस ना देखलीं।चला अब बनाइए देले हउवा त मनोज ओरी से आज क चाह पिया दा। काल्हीं से त आपन राम तोहरी ओरी चरन धरें त पाप।” परताप क खुनुस चाय के भाप संगे ऊपर उठत अदरक -इलायची के सुगंध साथे उड़त जात रहे।

मनोज क धियान इन्हन लोग के कलह-कुचरचा ओरी तनिको ना रहे ऊ त गुरुजी के बंद केवाड़ अउरी तीन बार खटकत कुंडी के रहस्य में उरझल रहलन।उनके चिंता में बूड़ल देख के अपने तिरछी मुस्कान के काबू में करत परताप कहलन ” अच्छा ! चला आज दिन बिसराम करा हमरे रूम पर।साँझी के सिवसंकर भैया से फिरो भेंट मुलाक़ात क कोसिस होई।ठीक न ?” मनोज के कान्ही पर हाथ धरत उठ खड़ा भइलन परताप।संगे चलत तन क असंगत भइल मन दुनू जानी के पकड़ से बाहर रहे।केहू तरे एहर -ओहर क बात करत, बिगरल मन के ठेकाने लगावे क कोशिश करत फिरो साँझी क शिवशंकर गुरू जी के गली में दुनू जनी ठाड़ रहलन।परताप के एना पारी कुंडी खटखटावे खातिर मनोज के धकिआवे के ना पड़ल।किवाड़ भेड़ल रहल , ओकरे फांफर में से बलब क पियरका रोशनी बाहर झाँकत रहे। रोशनी क ओट लिहले परताप भीतर देखे और ई जाने क पूरा कोशिश कइलन कि भईया कहीं एने -ओने हउवन कि ना। भइया त ना बाकिर जवने साया के छाया से ऊ बचल चाहत रहलन ऊ उनके धर लिहलस।परताप ओकरे चंगुल में फँसल अइसे घिघिआये लगलन कि मनोज डर के मारे काँपत थरथर आवाज़ में पूछ बइठलन-

” का भइल भइया ? कवनों असगुन -वसगुन ….।”अबहीं बात पूरा ना हो पावल कि परताप बुदबुदइलन –

” गोड़ लगत हईं भउजी। मनोज आवा गोड़ लागा भाय।” मनोज सोहर के गुरुजी के पत्नी क गोड़ लगलन।उनके लगल क गुरुजी ना सही उनकर अर्धांगिनी सही।आधा पुण्य त ऊ कमाई लिहलन।परताप अबहीं कुछ पुछले चाहत रहलन कि मनोज बाल सुलभ जिज्ञासा लिहले पूछ बइठलन – ” गुरुजी हईं न घरे अम्मा जी !  ?”

” के अम्मा ह इँहा ? आंय ?।” एतना सुंदर -सुभेक मेहरारू क बोली बानी एतनो उरेठ आ करकस हो सकेला,सपनों में ना सोचले रहलन मनोज।अकबका के गुरुजी के अर्धांगिनी ओरी निरखे लगलन।

” केवन गुरू आ केकर गुरू जी रे ? ” मनोज के हतचेत देखके परताप मोर्चा सम्हरलन।

” अरे ! आप गुरुजी क अर्धांगिनी! त हमहन क अम्मा भइलीं न ? एही से ई मनोज कहलन ह आपके अम्मा।”

” हम अपने लइकन क आजी -अम्मा हईं।कुल्ह टोला -महल्ला क ना।हे रे बीखुआ पानी पीआव …तोहन बइठा।हम बोलावत हईं।” कहके गुरुआइन भीतर चल गइलीं।ई लोग बैठका में बइठ के पानी आ गुरुजी क इंतज़ार करत रह गईलन बाकिर बीस-पच्चीस मिनट के बाद भी केहू ना आइल। हिम्मत करके परताप ओह कमरा ओरी गइलन जवने में गुरुआइन अदृश्य हो गइल रहलीं।

” ए भउजी ! भइया कब ले अइहन।कुछ बात भइल ह आपकS ?”

” आइल बा ? एतना हाली त हम मर जाइब तब्बो ना आई त तोहरे बोलवले आई निस्तनिया।”

” हम गुरुजी के पूछत रहलीं हं।”परताप घबरा गइलन।

” त का हम कवनों आन के कहत हईं ?” गुरुआइन क पारा चढ़े शुरू हो गइल रहे।

” त आप उनहीं क बात करत हईं ? परताप खीस सम्हारत कहलन।

” त केतना अदिमी रहेलन एह घर में ? ”

” एगो ऊ पापी त एगो ऊ।” एह ‘ऊ’ के समझे में माथा चकरा गइल परताप क। पीछे से मनोज उजबुक नियन इनहन दुनू जानी क बवाल बतकही सुनत रहलन।

” के पापी ? बोले में परताप क जीभ लड़खड़ा गइल।

” ऊहे अदिमिया।” गुरुआइन तमक के कहलीं।

” कवन ? आपकS ?” परताप हरान हो गइल रहलन।

” त का अनकर ?” कुढ़न से लाल हो अइलीं अम्मा।

” हम गुरुजी के पूछत हईं ,बीखुआ के ना ए भउजी ” परताप रुआँसा हो गइलन।

” हमहूँ त ओही अदिमिया के बतावत हईं।”

” त का फोन ना उठावत हउवन का गुरुजी ? ” एना पारी मनोज पुछलन।

” कवन गुरू जी ,केकर गुरू जी। मुँहफूंकना कब ले गुरू बन गइल ? आज ले हमार फोन उठवले ह कि अब उठाई ।पानी पिआवे के कहलीं ह त मोहपातर फरार हो गइल ह। ” गुरुआइन अउर लाल अंगार।

” हमहन बीखुआ के ना गुरू जी के पूछत हईं।”अब परताप  अउर मनोज दुनू जनी क धैर्य जबाब दे देले रहल।

” त का हम पिंगल पढ़त हईं कि तोहके ना बुझात ह पापी !” दाँत पीसत गुरुआइन कहलीं। अब दुनू जनी क सब्र क बाँध टूट गइल रहे बाकिर गुरु जी से भेंट मुलाक़ात क कवनों उपाय नज़र न आवत रहे तब्बो मनोज के लगे कि कवनों भी पल उनकर श्रद्धेय आ जइहन। इंतज़ार जारी रहे।

क्रमशः ……

  • डॉ सुमन सिंह

वाराणसी

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